रबी फसलों की अच्छी पैदावार के लिए शुष्क मौसम में पर्याप्त नमी और फसलों के लिए पानी पर्याप्त होना जरूरी है। लेकिन कई बार बारिश कम होने, सर्दियों में लंबे समय तक सूखा रहने या सिंचाई के लिए पानी की कमी के कारण खेतों में नमी घटने लगती है। ऐसी स्थिति में गेहूं, चना, सरसों और दूसरी रबी की फसलों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है। पौधों की पत्तियाँ मुरझाने लगती हैं और दाने बनने के समय पानी की कमी होने पर उत्पादन भी घट सकता है।
लगभग सूखे जैसी स्थिति बन जाती है, ऐसे में किसानों को घबराने के बजाय मिट्टी और पानी की स्थिति देखकर दलहन और तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों का चयन करना चाहिए और जरुरत के अनुसार ही सिंचाई करनी चाहिए। इस तरह फसल प्रबंधन के सही फैसले और कुछ जरूरी उपाय अपनाकर मिट्टी की नमी बचाई जा सकती है और फसल को सूखे के असर से काफी हद तक बचाया जा सकता है।
1. फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई करें
सूखे जैसी स्थिति में पानी का सही इस्तेमाल सबसे जरूरी है। खेत में पानी की उपलब्धता कम हो, तो सभी हिस्सों में एक साथ सिंचाई करने के बजाय फसल की जरूरत और उसकी अवस्था को प्राथमिकता दें। गेहूं में जड़ें बनने, कल्ले निकलने और बालियाँ बनने जैसी अवस्थाओं में पानी की कमी का असर अधिक हो सकता है। इसलिए इन महत्वपूर्ण अवस्थाओं पर विशेष ध्यान दें।
चना और सरसों में भी फूल आने तथा दाना बनने के समय नमी की जरूरत पर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, सिंचाई का सही समय मिट्टी के प्रकार, मौसम और फसल की अवस्था पर निर्भर करता है। खेत में जरूरत से ज्यादा पानी न दें, क्योंकि इससे पानी की बर्बादी हो सकती है।

2. मिट्टी की नमी बचाने के उपाय अपनाएँ
खेत की मिट्टी में मौजूद नमी को लंबे समय तक बनाए रखना सूखे से निपटने का एक अच्छा तरीका है। इसके लिए फसल की कतारों के बीच हल्की गुड़ाई की जा सकती है, लेकिन ध्यान रखें कि इससे फसल की जड़ों को नुकसान न पहुँचे। मिट्टी की सतह पर पपड़ी बनने से पानी के अवशोषण पर असर पड़ सकता है, इसलिए खेत की स्थिति के अनुसार उचित उपाय करें।
जहाँ संभव हो, फसल के अवशेषों या उपयुक्त जैविक सामग्री से मिट्टी को ढकने यानी मल्चिंग का सहारा लिया जा सकता है। इससे मिट्टी से नमी का वाष्पीकरण कम करने में मदद मिलती है। खेत में खरपतवारों को भी नियंत्रित करें, क्योंकि वे फसल के साथ पानी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
3. खरपतवार और कीट-रोगों पर नजर रखें
पानी की कमी से फसल पहले ही दबाव में रहती है। ऐसे में खरपतवार मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल कर सकते हैं। इसलिए खेत में समय-समय पर खरपतवारों की पहचान करें और जरूरत के अनुसार निराई-गुड़ाई करें।
इसके साथ ही फसल की पत्तियों, तनों और जड़ों की नियमित जाँच करें। पत्तियों का पीला पड़ना, पौधों का मुरझाना या बढ़वार रुकना नमी की कमी का संकेत हो सकता है। हालांकि, ये लक्षण पोषक तत्वों की कमी या कीट-रोगों के कारण भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए बिना कारण पहचाने किसी दवा या उर्वरक का इस्तेमाल न करें।

4. खाद और उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करें
सूखे की स्थिति में फसल को अधिक खाद देने से पैदावार बढ़ने की गारंटी नहीं होती। मिट्टी में नमी कम होने पर पौधे पोषक तत्वों को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाते। इसलिए मिट्टी की जाँच और फसल की जरूरत के आधार पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें।
नाइट्रोजन जैसे उर्वरकों की मात्रा और डालने का समय कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार तय करें। सूखी मिट्टी में बिना जरूरत उर्वरक डालने से अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। यदि खेत में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, तो उर्वरक के इस्तेमाल के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होने का ध्यान रखें।
5. उपलब्ध पानी का सही प्रबंधन करें
अगर पानी सीमित है, तो सिंचाई के लिए उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करें। खेत को समतल रखने और मेड़ों की उचित व्यवस्था से पानी को एक जगह से दूसरी जगह बहकर जाने से रोका जा सकता है। जहाँ संभव हो, स्प्रिंकलर या ड्रिप जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का उपयोग भी किया जा सकता है। हालांकि, गेहूं और चना जैसी फसलों में कौन-सी तकनीक उपयुक्त होगी, यह खेत और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है।
किसान स्थानीय मौसम पूर्वानुमान पर भी नजर रखें। यदि बारिश की संभावना है, तो उसके अनुसार सिंचाई की योजना बनाई जा सकती है। इससे पानी की बचत करने में मदद मिलेगी।

6. कृषि विशेषज्ञों की सलाह लें
यदि लंबे समय तक बारिश नहीं होती और फसल पर सूखे का असर स्पष्ट दिखाई देने लगता है, तो नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विभाग से संपर्क करें। विशेषज्ञ मिट्टी, फसल की अवस्था और पानी की उपलब्धता के आधार पर उचित सलाह दे सकते हैं। फसल की स्थिति देखकर ही किसी वैकल्पिक उपाय को अपनाना बेहतर होता है।
सूखे जैसी स्थिति में फसल को सुरक्षित रखने के लिए सही समय पर सही सलाह मिलना भी बेहद जरूरी है। एग्रीबाज़ार की एग्रीनो और क्रॉप डॉक्टर सेवाएं इस काम में किसानों की मदद कर सकती हैं। एग्रीनो के जरिए किसानों को फसल के अनुसार जरूरी कृषि गतिविधियों, मौसम, सिंचाई और फसल प्रबंधन से जुड़ी जानकारी मिलती है। वहीं, क्रॉप डॉक्टर की मदद से किसान फसल की प्रभावित पत्तियों या पौधों की तस्वीर साझा करके कीट, रोग और पोषक तत्वों की कमी जैसी समस्याओं की पहचान और उनके समाधान के लिए विशेषज्ञों से सलाह ले सकते हैं। इससे किसान समय रहते फसल की समस्या पर ध्यान देकर उचित कदम उठा सकते हैं। इसके अलावा, एग्रीबाज़ार का डिजिटल मार्केटप्लेस किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए खरीदारों और बाजार के अवसरों से जोड़ता है। इसकी सहयोगी कंपनी स्टारएग्री सुरक्षित वेयरहाउसिंग सेवाएं देती है, जबकि एग्रीवाइज किसानों एवं व्यापारियों को वित्तीय सेवाएं प्रदान कर आगे बढ़ने के लिए मदद करता है।
FAQ’s:
1. सूखे जैसी स्थिति में रबी की कौन-सी फसलें उगाना बेहतर है?
कम पानी की उपलब्धता वाले क्षेत्रों में चना, मसूर और सरसों जैसी दलहन एवं तिलहन फसलों पर विचार किया जा सकता है। फसल का चयन मिट्टी, जलवायु और सिंचाई की सुविधा के अनुसार करना चाहिए।
2. सूखे में गेहूं की फसल को पानी कब देना चाहिए?
गेहूं में शुरुआती जड़ विकास (क्राउन रूट इनिशिएशन), कल्ले निकलने और दाना भरने की अवस्था में सिंचाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
3. खेत की मिट्टी में नमी लंबे समय तक कैसे बनाए रखें?
फसल अवशेषों से मल्चिंग करें, अनावश्यक जुताई से बचें और खेत की मेड़ों को दुरुस्त रखें। इससे मिट्टी से नमी का नुकसान कम करने में मदद मिलती है।
4. सूखे की स्थिति में खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल कैसे करें?
मिट्टी की जाँच और फसल की जरूरत के अनुसार ही खाद एवं उर्वरकों का इस्तेमाल करें। सूखी मिट्टी में बिना जरूरत अधिक उर्वरक डालने से बचें।
5. सूखे से फसल प्रभावित होने पर कहां सलाह लें?
नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या कृषि विभाग से संपर्क करें।
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